29 अगस्त 2012 - 19:30

गुट निरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देशों के प्रमुखों, प्रतिनिधि मंडलों और इस अंतर-राष्ट्रीय सम्मेलन में अन्य भाग लेने वालों का मैं स्वागत करता हूँ...........

प्रिय अतिथियों, गुट निरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देशों के प्रमुखों, प्रतिनिधि मंडलों और इस अंतर-राष्ट्रीय सम्मेलन में अन्य भाग लेने वालों का मैं स्वागत करता हूँ।हम यहाँ इस उद्देश्य से एकत्रित हुए हैं कि परवरदिगार की सहायता और निर्देशन से इस अभियान और आंदोलन की, कि जिसकी छः दशक पहले कुछ हमदर्द राजनीतिक नेताओं की बुद्धिमत्ता परिस्थितियों की समझ के परिणाम स्वरूप शुरूआत हुई थी, उसे संसार की वर्तमान आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुसार आगे बढ़ाएं,  बल्कि उसमें नई जान डालें और एक नई हलचल पैदा करें।भौगोलिक हिसाब से दूर और पास के क्षेत्रों से हमारे अतिथि यहाँ आए हैं जिनका संबन्ध अलग अलग राष्ट्र और नस्लों से है और जो विभिन्न प्रकार के विश्वास, संस्कृति, ऐतिहासिक और विरासती प्रष्ठभूमि रखते हैं लेकिन जैसा कि इस आंदोलन की नींव रखने वालों में से एक अहमद सूकारनू ने 1955 की मशहूर बान्डूँग बैठक में कहा था, कि गुट निरपेक्ष आंदोलन का आधार भौगोलिक, नस्ली, और दीनी रूप में समानता नहीं है बल्कि आवश्यकताओं का एक जैसा होना है। उस समय गुट निरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देशों को आपस में ऐसे रिश्ते की तलाश थी जो उन्हें पद के लालची, घमन्डी, और कभी सेर न होने वाले नेटवर्कों के क़ब्ज़े से बचाए रखे, शासन पसन्दी में विकास और बढ़ावे के बाद आज भी यह आवश्यकता उसी तरह मौजूद है।मैं एक और वास्तविकता सामने लाना चाहता हूँ।इस्लाम ने हमें यह सिखाया है कि नस्ल, ज़बान, और संस्कृति के एक जैसा न होने के बावजूद इंसानों के अन्दर एक जैसी फ़ितरत मौजूद है जो उन्हें पवित्रता, समानता, अच्छे काम करने, हमदर्दी, और एक दूसरे की सहायता की दावत देती है और यही सामान्य स्वभाव है जो गुमराह कर देने वाली भावनाओं से आसानी से गुज़र जाने की स्थिति में इन्सानों को तौहीद (एकेश्वरवाद) और अल्लाह की पहचान की तरफ़ ले जाता है।इस स्पष्ट वास्तविकता में ऐसी क्षमता है कि वह स्वतंत्र, सरबुलन्द और एक ही समय में विकास और समानता से सजे हुए समाज की बनावट का आधार और सहायक बन सकती है, इन्सानों की तमाम व्यक्तिगत और दुनियावी सरगर्मियों को आध्यामिकता की चमक दे सकती है और आख़ेरत की जन्नत से पहले जिसका वादा इश्वरीय धर्मों ने किया है दुनियावी जन्नत बना सकती है यही सामान्य और साझे की वास्तविकता है जो इन राष्ट्रों के भाईचारे का आधार बन सकती है जो ज़ाहिरी शक्ल व सूरत, इतिहास और भौगोलिक हिसाब से आपस में कोई समानता नहीं रखते।जब इस प्रकार के ढाँचे पर वैश्विक सहायता की बनावट होगी तो शासन भय व डर, कब्जा और एकतरफ़ा लाभ के आधार पर नहीं और अंत्रात्मा बेचने वाले और विश्वासघात करने वाले लोगों के ज़रिए नहीं बल्कि सेहतमंद, संयुक्त लाभ के आधार पर और इस से भी ज़्यादा इंसानियत के लाभ को देखते हुए आपस में सम्बंध बनाऐंगे और अपने जागरूक दिल व दिमाग़ और अपने राष्ट्रों के दिलों को हर फ़िक्र से नजात दिला सकते हैं।यह व्यवस्था, चालू व्यवस्था के बिल्कुल विपरीत बिंदु पर है कि वर्तमान सदियों के दौरान क़ब्ज़ा करने की इच्छुक पश्चिमी शासन और आज अमरीका की आक्रमक और साम्राज्यवादी शासन जिस की ठेकेदार. प्रचारक और दावेदार है।..........166